तुलसीदास, धनुष- भंग(PART-2)

UP Board Class-10 Hindi( काव्य/पद्य खण्ड) (PART- 1) Lesson-2 धनुष भंग (बालकांड), कवि-तुलसीदास
 

💥तुलसीदास💥

📚📚पाठ-1📚📚

🌈धनुष भंग🌈


1. उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बालपतंग। 
बिकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन श्रृंग।। [ 2017]

सन्दर्भ- प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ हमारी पाठ्य पुस्तक 'हिन्दी' के 'काव्य-खण्ड' के 'धनुष भंग' कविता से लिया गया हैं। यह गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। 
व्याख्या- तुलसीदास जी कहते हैं कि उदयाचल पर्वत के समान बने हुए विशाल मंच पर श्रीरामचन्द्र जी के रूप में बाल सूर्य के उदित होते ही सभी सन्त रूपी कमल खिल उठे और नेत्ररूपी भंवरे हर्षित हो उठे।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. यहाँ पर मंच की विशालता और श्रीरामचन्द्र जी के सौन्दर्य का वर्णन किया गया है।
2. भाषा-अवधी
3. शैली-प्रबन्ध और चित्रात्मक।
4. रस-अद्भुत । 
5. छन्द-दोहा।।
6. अलंकार-उपमा, रूपक और अनुप्रास अलंकार
7. गुण-माधुर्य 

2.नृपन्ह केरि आसा निसि नासी बचन नखत अवलीन प्रकासी।
मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने॥ 
भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरसहिं सुमन जनावहि सेवा॥ 
गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा॥ 
सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी॥ 
चलत राम सब पुर नर नारी ।पुलक पूरि तन भए सुखारी॥ 
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥ 
तौ सिवधनु मुनाल की नाईं। तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं॥ 

व्याख्या- गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी के मंच पर चढ़ते ही सभा में उपस्थित अन्य राजाओं की आशारूपी रात्रि नष्ट हो गयी और उनके वचनरूपी तारों के समूह का चमकना बन्द हो गया, अर्थात् वे मौन हो गये। अभिमानी राजारूपी कुमुद संकुचित हो गये और कपटी राजारूपी उल्लू छिप गये। मुनि और देवतारूपी चकवे प्रसन्न हो गये। वे फूलों की वर्षा करके अपनी सेवा प्रकट करने लगे। इसके पश्चात् श्रीरामचन्द्र जी ने अत्यधिक स्नेह के साथ अपने गुरु विश्वामित्र के चरणों की वन्दना करने के बाद वहाँ उपस्थित अन्य मुनियों से भी आज्ञा माँगी। श्रीरामचन्द्र जी सुन्दर, मतवाले और श्रेष्ठ हाथी की चाल से चले जो कि उनकी स्वाभाविक चाल थी। श्रीरामचन्द्र जी के चलते ही सभा में उपस्थित नगर के सभी स्त्री-पुरुष प्रसन्न हो गये और उनके शरीर रोमांच से पुलकित हो गये। समस्त स्त्री-पुरुषों ने अपने पूर्वजों की वन्दना की और अपने पुण्य कर्मों का स्मरण करते हुए कहा कि हे गणेश जी ! यदि हमारे किये हुए पुण्य कर्मों का किंचित् भी फल मिलता हो तो श्रीरामचन्द्र जी शिवजी के इस प्रचण्ड धनुष को कमल की नाल (दण्ड) के समान तोड़ डालें।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. शब्दशक्ति-अभिधा और व्यंजना। 
2. भाषा-अवधी 
3. शैली-प्रबन्ध और वर्णनात्मक।
4. रस-भक्ति। 
5. छन्द-दोहा।
6. अलंकार-रूपक और अनुप्रास अलंकार। 
7. गुण -प्रसाद।

3. रामहि प्रेम समेत लखी, सखी समीप बुलाई। 
सीता मातु सनेह बस, बचन कहइ बिलखाई।

व्याख्या- तुलसीदास जी कहते हैं कि मंच पर अवतरित हुए श्रीरामचन्द्र जी को अत्यधिक वात्सल्य भाव के साथ देखकर जनकनन्दिनी सीताजी की माता ने अपनी सभी सखियों सहेलियों को अपने समीप बुला लिया और स्नेहवश विलाप करते हुए उनसे कहने लगीं।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. गुण- प्रसाद 
2. भाषा-अवधी
3. शैली -प्रबन्ध
4. रस-वात्सल्य।
5. छन्द- दोहा।
6. अलंकार -अनुप्रास 

4.सखी सब कौतुक देख निहारे, जेउ कहावत हितू हमारे। 
कोउ न बुझाई कहइ गुर पाहीं,ए बालक असी हठ भली नाहीं।
रावन बान छुआ नहीं चापा, सकल भूपि करी दापा।
सो धनु राजकुर कर देहि, बाल मराल कि मंदर लेहीं। 
भूप सयानप सकल सिरानी,सखी बिधि गति कछु जात नजानी।
बोली चतुर सखी मृदु बानी, तेजवंत लघु गनीअ न रानी। 
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा, सोषेउ सुजसु सकल संसारा।
रबी मंडल देखत लघु लागा, उदय तासु तिभुवन तम भागा।

व्याख्या- गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी की माता अपनी सखी से कह रही हैं कि है सखी! ये जो हमारे हित की चिन्ता करने वाले लोग हैं, वे सब भी तमाशा ही देखने वाले हैं। कोई भी इनके गुरु (विश्वामित्र) को समझाकर यह नहीं कहता है कि ये श्रीराम बालक हैं और इनके लिए ऐसा हठ करना उचित नहीं है। रावण और बाण जैसे असुरों ने भी जिस धनुष को छुआ तक नहीं और यहाँ उपस्थित सभी राजा घमण्ड करके पराजित हो गये, वही धनुष इस सुकुमार रामचन्द्र के हाथ में दे रहे हैं। कोई इन्हें यह क्यों नहीं समझाता कि हंस के बच्चे भी कहीं मन्दराचल पर्वत को उठा सकते हैं। सीताजी की माता कहती हैं कि दूसरों की क्या कही जाये, राजा जनक तो स्वयं बड़े समझदार और ज्ञानी हैं, उन्हें तो गुरु विश्वामित्र को समझाने की चेष्टा करनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि उनका भी समस्त ज्ञान और सयानापन समाप्त हो गया है। हे सखी। क्या करू, विधाता (ब्रह्मा) की गति अर्थात् वे क्या चाहते हैं; कुछ समझ में नहीं आ रही है। तब उनकी एक चतुर सखी कोमल वाणी में उनसे कहती है कि "हे रानी देखने में छोटा होने पर भी तेज से युक्त मनुष्य को छोटा नहीं मानना चाहिए। कहाँ घड़े से उत्पन्न होने वाले छोटे से मुनि अगस्त्य और कहाँ विशाल समुद्र। लेकिन उन्होंने उस समुद्र को सोख लिया। सूर्यमण्डल भी देखने में कितना छोटा लगता है, लेकिन उसके उदय होते ही तीनों लोकों का अन्धकार भाग जाता है। 
काव्यगत सौन्दर्य:-
1.भाषा-अवधी
2. शैली-प्रबन्ध और विवेचनात्मक।
3. रस-वात्सल्य
4. छन्द-चौपाई।
5. अलंकार-अनुप्रास 
6. गुण- प्रसाद।

5. मंत्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब । 
महामत्त गजराज कहूँ, बस कर अंकुस खर्ब ।।

व्याख्या- तुलसीदास जी कहते हैं सीताजी की माता कि सखी विभिन्न उदाहरणों के द्वारा उनको समझाती हुई कहती हैं कि, "जिस मन्त्र के वश में सभी देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि भी रहने को विवश होते हैं, वह मन्त्र भी अत्यधिक छोटा ही होता है। अत्यधिक विशाल और मदमत्त गजराज को भी महावत छोटे से अंकुश के द्वारा अपने वश में कर लेता है। 
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. भाषा अवधी
2. शैली - प्रबन्ध और उद्धरण।
3. छन्द- दोहा।
4. अलंकार अनुप्रास ।
5. शब्दशक्ति-अभिधा और लक्षणा ।

6.काम कुसुम धनु सायक लीन्हे सकल भुवन अपने बस कीन्हे।
देबि तजिअ संसउ अस जानी भेजब धनुषु राम सुनु रानी सखी बचन सुनि भै परतीती मिटा बिषादु बढी अति प्रीती। 
तब रामहि बिलोकि बैदेही समय हृदयँ बिनवति जेहि तेही। 
मनहीं मन मनाव अकुलानी होहु प्रसन्न महेस भवानी ॥
करहु सफल आपनि सेवकाई करि हितु हरहु चाप गरुआई ॥ 
गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुझे सेवा॥
बार बार बिनती सुनि मोरी करहु चाप गुरुता अति थोरी।

व्याख्या- पुनः सीताजी की माताजी की सहेली उनको समझाती हुई कहती है कि कामदेव ने फूलों का ही धनुष-बाण लेकर समस्त लोकों को अपने वशीभूत कर रखा है।हे देवी इस बात को अच्छी तरह से समझकर आप अपने सन्देह का त्याग कर दीजिए। हे रानी श्रीरामचन्द्र जी धनुष को अवश्य ही तोड़ देंगे। सखी के मुख से इस प्रकार के सान्त्वनादायक वचनों को सुनकर उनको श्रीरामचन्द्र जी की सामर्थ्य के सम्बन्ध में विश्वास हो गया। उनकी उदासी समाप्त हो गयी और श्रीराम के प्रति उनके मन में स्नेह और भी अधिक बढ़ गया। इसी समय श्रीरामजी को देखकर सीताजी भी सभी देवता से रामजी की सहायता हेतु विनती करने लगीं। सीताजी व्याकुल होकर मन ही मन में प्रार्थना कर रही हैं कि हे भगवान् शंकर हे माता पार्वती मुझ पर प्रसन्न हो जाइए और मैंने आपकी जो कुछ भी सेवा आराधना की है उसका सुफल प्रदान करते हुए और मुझ पर कृपा करके धनुष की गुरुता अर्थात् भारीपन को कम कर दीजिए।" पुनः गणेश जी की प्रार्थना करती हुई कहती हैं कि "हे गणेश जी मैंने आज ही के दिन के लिए अर्थात् श्रीराम जैसे पुरुष को पति रूप में प्राप्त करने की इच्छा से आपकी पूजा-अर्चना की थी। आप बार-बार की जा रही मेरी विनती को सुनिए और धनुष के भारीपन को बहुत ही कम कर दीजिए।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. शब्दशक्ति- अभिधा 
2. भाषा-अवधी
3. शैली प्रबन्ध और वर्णनात्मक
4. रस- भक्ति। 
5. छन्द-चौपाई।
6. अलंकार अनुप्रास और पुनरुक्तिप्रकाश
7. गुण प्रसाद।

7.देखि देखि रघुबीर तन, सुर मनाव धरि धीर। 
भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली सरीर। 

व्याख्या- तुलसीदास जी कहते हैं कि सीताजी बार-बार श्रीरामचन्द्र जी की ओर देख रही हैं। और धैर्य धारण करके देवताओं को मनोवांछित वर प्रदान करने के लिए मनाती जा रही हैं। उनके नेत्रों में प्रेम के आँसू भरे हुए हैं और शरीर में रोमांच हो रहा है।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. छन्द - दोहा
2. भाषा-अवधी।
3. शैली -प्रबन्ध और वर्णनात्मक।
4. रस-श्रृंगार
5. अलंकार-पुनरुक्तिप्रकाश, रूपक और अनुप्रास। 
6. गुण- माधुर्य। 

8.नीके निरखि नयन भरि सोभा। पितु पन सुमिरि बहुरि मनु छोभा।
अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी ॥ 
सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई ॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा। 
बिधि केहि भाँति धरों उर धीरा सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ॥ 
सकल सभा के मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी ॥ 
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी ॥ 
अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुर्ग सय सम जाहीं।

व्याख्या- तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी की शोभा-सौन्दर्य को जी भरकर देख लेने के पश्चात् और पिता के प्रण का स्मरण करके सीताजी का मन दुःखी हो जाता है। वे मन-ही मन विचार करने लगती हैं ओह! पिताजी ने बहुत ही कठोर हठ ठान ली है और वे इसको कुछ भी लाभ-हानि समझ नहीं पा रहे हैं। भयभीत होने के कारण कोई भी मन्त्री उन्हें उचित सलाह नहीं दे रहा है। वस्तुतः विद्वानों की सभा में यह बड़ा ही अनुचित कार्य हो रहा है। यह धनुष तो वज्र से भी अधिक कठोर है, जिसके समक्ष ये कोमल शरीर वाले की क्या तुलना। सीताजी ब्रह्मा से कहती हैं कि "भाग्य को लिखने वाले हे विधाता। मैं अपने हृदय में किस तरह से धैर्य धारण करू, क्या कहीं शिरीष के फूल के कण से हीरे को छेदा जा सकता है। अत: सब ओर से निराश होकर हे शिवजी के धनुष ! अब मुझे केवल तुम्हारा ही सहारा है। अब तुम अपनी कठोरता लोगों पर डाल दो और श्रीरामचन्द्र जी के सुकुमार शरीर को देखकर उतने ही हल्के हो जाओ। इस प्रकार विचार करते-करते सीताजी के मन में इतना सन्ताप हो रहा है कि पलक झपकने में लगने वाले समय (निमेष) का एक अंश भी सौ युगों (समये मापन का अत्यधिक दीर्घ परिमाण) के समान व्यतीत हो रहा है।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. गुण-माधुर्य और प्रसाद 
2. भाषा अवधी
3. शैली-प्रबन्ध
4. रस- श्रृंगार
5.छन्द- दोहा
6. अलंकार- अनुप्रास और उपमा। 

9. प्रभूहि चितइ पुनी चितव माही, राजत लोचन लोल। 
खेल मनसिज मीन जुग, जनु बिधु मंडल डोल ।।
व्याख्या- गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं कि पहले प्रभु श्रीरामचन्द्र जी की ओर देखकर और तत्पश्चात् लज्जा से पृथ्वी की ओर देखती हुई सीताजी के चंचल नेत्र इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं मानो चन्द्रमण्डल रूपी डोल में कामदेव की दो मछलियाँ क्रीड़ा कर रही हों।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. नेत्रों की चंचलता की तुलना मछलियों से की गयी है।
2. भाषा- अवधी।
3. शैली- प्रबन्ध और वर्णनात्मक
4. रस- श्रृंगार
5. छन्द- दोहा
6. अलंकार- उत्प्रेक्षा और अनुप्रास
7. गुण- माधुर्य।

10. गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी, प्रगट न लाज निसा अवलोकी।
लोचन जल रह लोचन कोना, जैसे परम कृपन कर सोना ॥ 
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी, धरि धीरजु प्रीतिति उर आनी ॥ 
तन मन बचन मोर पनु साचा, रघुपति पद सरोज चितु राचा ॥ 
तो भगवानु सकल उर बासी, करिहि मोहि रघुबर के दासी ॥ 
जेहि के जेहि पर सत्य सनेहू, सो तेहि मिलइ न कछु संदेह ॥ 
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना, कृपानिधान राम सब जाना ॥
सिटि बिलोकि तकेउ धनु कैसे, चितव गरुरु लघु व्यालहि जैसे।

व्याख्या- सीताजी की वाणी रूपी भ्रमरी को उनके मुख रूपी कमल ने रोक रखा है। अर्थात उनके मुख से आवाज ही नहीं निकल पा रही है। लज्जा रूपी रात्रि को सम्मुख देखकर भी वह प्रकट नहीं हो पा रही है। नेत्रों का जल नेत्रों के कोने में उसी प्रकार रुक गया है जैसे अत्यधिक कंजूस का गड़ा हुआ सोना गड़ा ही रह जाता है। अपनी इस बढ़ी हुई व्याकुलता को समझकर सीताजी प्रीतिपूर्वक संकोच करने लगीं। तत्पश्चात् उन्होंने हृदय में धैर्य धारण करके मन में विश्वास किया कि यदि तन, मन और वन से मेरा प्रण सच्चा है और श्रीरामचन्द्र जी के चरण कमलों में मेरा हृदय वास्तव में अनुरक्त है तो सभी के हृदय में निवास करने वाले ईश्वर मुझे उन रघुकुल श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्र जी की पत्नी अवश्य ही बनाएँगे; क्योंकि जिस किसी पर भी जिस किसी का सच्चा स्नेह होता है, वह उसे मिलता ही है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। प्रभु श्रीरामचन्द्र जी की ओर देखकर सीताजी ने अपने प्रेम का निश्चय कर लिया; अर्थात् इस बात का निश्चय कर लिया कि अब यह शरीर या तो इन्हीं (श्रीराम) का होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं। उनके इस निश्चय को कृपानिधान श्रीरामचन्द्र जी तुरन्त जान गये। इसके पश्चात् उन्होंने सीताजी की ओर देखकर धनुष की ओर इस प्रकार देखा जैसे गरुड़ छोटे से सर्प ओर देखता है।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. भाषा अवधी
2. शैली प्रबन्ध और चित्रात्मक
3. रस शृंगार
4. छंद दोहा
5. अलंकार- अनुप्रास, रूपक व उपमा
6. गुण-माधुर्य और प्रसाद
7. शब्द-शक्ति-अभिधा और लक्षणा।

11.लखन लखेउ रघुबंसमनि, ताकेउ हर कोदंडु। 
पुलकि गात बोल बचन, चरने चापि ब्रह्मांडु ॥ [2018] 

व्याख्या- गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि जब लक्ष्मण जी ने देखा कि श्रीरामचन्द्र जी ने शिवजी के धनुष की ओर देखा है तो उनका शरीर अत्यधिक पुलकित हो उठा और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को अपने दोनों चरणों से दबाकर वे इस प्रकार बोले।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. गुण ओज
2. भाषा अवधी।
3. शैली प्रबन्ध
4. रस- वीर।
5. छन्द- दोहा।
6. अलंकार- अनुप्रास और अतिशयोक्ति। 

12.दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।
राम चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा ॥ 
चाप समीप रामु जब आए नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए ॥ 
सब कर संसउ अरु अग्यानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू ।भृगुपति केरि गरब गरु आई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदाई ॥ 
सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिह कर दारुन दुख दावा ॥ संभुचाप बड़ बोहितु पाई। चढे जाइ सब संगु बनाई ॥ 
राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू।। 

व्याख्या- गोस्वामी तुलसीदास जी कह रहे हैं कि लक्ष्मण जी ने कहा- हे दिग्गजो हे कच्छप! हे शेषनाग ! हे वाराह ! धैर्य धारण करके इस पृथ्वी को इस प्रकार पकड़े रखो, जिससे यह हिलने न पाये। श्रीरामचन्द्र जी शंकर जी के धनुष को तोड़ना चाहते हैं, इसलिए आप सभी लोग मेरी इस आज्ञा को सुनकर सावधान हो जाइए। श्रीरामचन्द्र जी जब शंकर जी के धनुष के समीप आये तब सभी उपस्थित स्त्री-पुरुषों ने देवताओं और अपने पुण्यों को मनाया। सभी का सन्देह और अज्ञान, मामूली तुच्छ राजाओं का अभिमान, परशुराम जी के गर्व की गुरुता, देवताओं और श्रेष्ठ मुनियों की भय, सीता जी का विचार, जनक का पश्चात्ताप और समस्त रानियों के दारुण दुःख का दावानलः ये सभी शिवजी के धनुष रूपी बड़े जहाज को प्राप्त करके समूह बनाकर उसके ऊपर चढ़कर और श्रीरामचन्द्र जी की भुजाओं के बले रूपी अपारे समुद्र के पार जाना चाहते हैं, लेकिन उनके साथ कोई नाविक नहीं है।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. गुण ओज और प्रसाद
2. भाषा अवधी।
3. शैली प्रबन्ध
4. रस-वीर और शान्त 
5. छन्द- चौपाई
6. अलंकार अनुप्रास
7. शब्द शक्ति अभिधा और लक्षणा। 

13. राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि।। 
चितई सीय कृपायतन, जानी बिकल बिसेषि।। 

व्याख्या- गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी ने सभा में उपस्थित सभी लोगों की ओर देखा। ये सभी लोग उन्हें मूर्तिवत दिखाई पड़े। इसके पश्चात् श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी की ओर देखा और उनको इन सबसे अधिक व्याकुल अनुभव किया।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. भाषा अवधी।
2. शैली -प्रबन्ध व चित्रात्मक। 
3. रस- शान्त और श्रृंगार ।
4. छन्द- दोहा।
5. अलंकार-उपमा और अनुप्रास। 
6. शब्द शक्ति-अभिधा। 
7. गुण प्रसाद और माधुर्य ।

14. बिपुल बिकल बैदेही निमिष बिहात कलप सम तेही। 
तृषित बारि बिन जो तनु त्यागा मुएँ करइ को सुधा तड़ागा।
का बरषा जब कृषी सुखाने समय चुके पुनि का पछिताने॥ 
असे जिये जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी। गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा। अति लाघव उठाइ धनु लीन्हा॥ दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ। 
लेत चढ़ावत बचत गाढे। काहुँ न लखा देख सबु ठाढे ॥ 
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।। 

व्याख्या- गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी को बहुत ही व्याकुल देखा । उन्होंने अनुभव किया कि उनका एक-एक क्षण एक-एक कल्प (चार अरब बत्तीस करोड़ वर्ष : 4,32,00,00,000) के समान व्यतीत हो रहा था। यदि प्यासा व्यक्ति पानी न मिलने पर अपना शरीर छोड़ दे, तो उसके चले जाने पर अमृत का तालाब भी क्या करेगा, सारी खेती के सूख जाने पर वर्षा किस काम की, समय के बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ। अपने हृदय में ऐसा विचार करके श्रीरामचन्द्र जी ने सीताजी की ओर देखा और उनका अपने प्रति विशेष प्रेम देखकर वे हर्षित हो उठे। मन-ही-मन उन्होंने गुरु विश्वामित्र को प्रणाम किया और अत्यधिक स्फूर्ति के साथ धनुष को उठा लिया। जैसे ही उन्होंने धनुष को अपने हाथ में उठाया, वह उनके हाथ में बिजली की तरह चमका और आकाश में मण्डलाकार हो गया। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि सभा में उपस्थित लोगों में से किसी ने भी श्रीरामचन्द्र जी को धनुष उठाते चढ़ाते और जोर से खींचते हुए नहीं देखा अर्थात् ये तीनों ही काम इतनी शीघ्रता से हुए कि इसका किसी को पता ही नहीं लगा। सभी ने श्रीरामचन्द्र जी को मात्र खड़े देखा और उसी क्षण उन्होंने धनुष को बीच से तोड़ डाला। धनुष के टूटने की ध्वनि इतनी भयंकर हुई कि वह तीनों लोकों में व्याप्त हो गयी ।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. शब्द शक्ति-अभिधा। 
2. भाषा अवधी। 
3. शैली प्रबन्ध। 
4. रस शृंगार और अद्भुत ।
5. छन्द दोहा।
6. अलंकार अनुप्रास और उत्प्रेक्षा ।
7. गुण. माधुर्य। 

15. भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। 
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं ॥

व्याख्या- गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि धनुष टूटने का घोर कठोर शब्द तीनों लोक में फैल गया जिससे सूर्य के घोड़े अपना नियत मार्ग छोड़कर चलने लगे, आठों दिशाओं में स्थित आठ दिग्गज अर्थात् दिशाओं की रक्षा करने वाले आठ हाथी चिंघाड़ने लगे, सम्पूर्ण पृथ्वी डोलने लगी; शेषनाग, वाराह और कछुआ भी बेचैन हो उठे देवता, राक्षसगण और मुनिजन कानों पर हाथ रखकर (जिससे ध्वनि सुनाई न पड़े) व्याकुल होकर विचार करने लगे कि यह क्या हो रहा है। अन्ततः जब सभी को इस बात का निश्चय हो गया कि श्रीरामचन्द्र जी ने शंकर जी के धनुष को तोड़ दिया है तब सब उनकी जय जयकार करने लगे।
काव्यगत सौन्दर्य:-
1. शब्द शक्ति अभिधा। 
2. भाषा अवधी। 
3. शैली - प्रबन्ध व चित्रात्मक ।
4. रस- अद्भुत।
5. छन्द- सवैया।
6. अलंकार अनुप्रास और अतिशयोक्ति ।
7. गुण ओज। 

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