Lesson-2, History भारत में राष्ट्रवाद(Nationalism in India)

Class-10 History Notes in Hindi chapter-2 Nationalism in India (अध्याय-2 भारत में राष्ट्रवाद) 

भारत और समकालीन विश्व-2

UP/NCERT  Notes for CBSE/UP Class 10 Social Science(भारत और समकालीन विश्व-2), Nationalism in India(भारत मे राष्ट्रवाद): 

Class-10th, History chapter-2, Nationalism in India Notes in Hindi

📙अध्याय-2📙

🌍🇮🇳भारत में राष्ट्रवाद🇮🇳🌏

भारत में राष्ट्रवाद का उदय यूरोपियन राष्ट्रवाद के साथ हुआ हैं। राष्ट्रवाद एकता की भावना जो ऐतिहासिक, धार्मिक, संस्कृति पर आधारित होती है। इस भावना से जो प्रेरणा लेता है वो जरूर अपनी एक अलग पहचान बनाता है ।भारत में राष्ट्रवाद में हमें बहुत सारी बातों के बारे में पता चलता है, जैसे:- प्रथम विश्वयुद्ध ,सत्याग्रह का विचार, रॉलट एक्ट, असहयोग आन्दोलन आदि। इसके साथ भारत में राष्ट्रवाद से बहुत सारी चीजें जुड़ी है। तो आइए जानते हैं भारत में राष्ट्रवाद के बारे में yourknowledge के साथ।  

इस अध्याय के मुख्य बिन्दु:---
🔹भारत में राष्ट्रवाद की शुरुआत कैसे हुई
🔹भारत में राष्ट्रवाद का कारण
🔹पहला विश्व युद्ध (1919)
🔹सत्याग्रह पर विचार 
🔹रॉलट एक्ट(1919)
🔹जालियाँवाला बाग हत्याकांड (1919)
🔹खिलाफत आन्दोलन (1919)
🔹असहयोग आन्दोलन 
🔹सवनिय अवज्ञा की ओर 
🔹साइमन कमीशन
🔹नमक और सविनय अवज्ञा आन्दोलन
🔹लोगो ने कैसे आन्दोलन को देखा  
🔹सविनय अवज्ञा आन्दोलन की सीमाए
🔹भारत में राष्ट्रवाद  के महत्वपूर्ण प्रश्न-उत्तर, MCQ

भारत में राष्ट्रवाद की शुरुआत कैसे हुई:- भारत में राष्ट्रवाद की शुरुआत 19वीं शताब्दी से शुरू हुई थी। ब्रिटिश साम्राज्य की नीतियों और उनकी चुनौतियों से भारत में राष्ट्र के रूप में सोचना शुरू किया इसका आधारशीला ब्रिटिश शासन से हुई।

✴️भारत में राष्ट्रवाद का कारण:- 1857 को भारत में राष्ट्रवाद के उदय का मुख्य कारण माना जाता है। इसे सैनिक विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है।

✴️प्रथम विश्व युद्ध के प्रभाव :-  भारत ने पहले विश्वयुद्ध में कभी आतंरिक रूप से भाग नहीं लिया था।युद्ध के कारण रक्षा संबंधी खर्चे में बढ़ोतरी हुई थी। इसे पूरा करने के लिए कर्जे लिये गए और टैक्स बढ़ाए गए। जिससे चीजों की कीमतें बढ़ गईं।1913 से 1918 के बीच लोगो को सेना में जबरन भर्ती किया गया । 1918-1920 बहुत सारी फसल ख़राब हो गयी थी। 1921 की जनगणना के अनुसार महामारी के कारण 120-130लाख लोग मारे गए थे।

✴️सत्याग्रह का विचार :-   महात्मा गाँधी जनवरी 1915 में भारत वापस लौटे उनके रूप में भारत को एक नया नेता मिला। गांधीजी ने जनांदोलन का एक अनोखा तरीका अपनाया था जिसे सत्याग्रह से जाना जाता है। सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता था। गांधीजी का मानना था की अपनी लड़ाई अहिंसा से भी जीती जा सकती है। 
बिहार के चंपारण जिले में (1916), गुजरात के खेड़ा में (1917) और 1918 मे  मिल मजदूरों के बीच सत्याग्रह आन्दोलन चलाने अहमदाबाद पहुँच गए। 

✴️रॉलैट ऐक्ट/काला कानून (1919 ) :-   इसे ना अपील, ना दलील ना वकील कानून भी कहा जाता हैं। इंपीरियल लेगिस्लेटिव काउंसिल द्वारा 1919 में रॉलैट ऐक्ट या काला कानून को पारित किया गया था। भारतीय सदस्यों ने इसका समर्थन नहीं किया था, लेकिन फिर भी यह पारित हो गया था । इस कानून के तहत सरकार को राजनैतिक गतिविधियों को कुचलने और राजनैतिक कैदियों को दो साल तक बिना मुकदमा चलाए जेल मे बंदी बनाया जा सकता था। 

✴️जलियांवाला बाग की घटना :-  10अप्रैल 1919 को अमृतसर में पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई। इसके कारण लोगों ने जगह-जगह पर सरकारी संस्थानों पर आक्रमण किया। अमृतसर में मार्शल लॉ लागू हो गया और इसकी कमान जेनरल डायर के हाथों में सौंप दी गई।जलियांवाला बाग हत्याकांड 13 अप्रैल 1919 को उस दिन हुआ, जिस दिन अमृतसर में बैसाखी मेले मे ग्रामीणों का एक जत्था जलियांवाला बाग में लगे एक मेले में शरीक होने आया था यह बाग चारों तरफ से बंद था और जनरल डायर ने निकलने के सारे रास्ते बंद करवा दिये और भीड़ पर गोलियाँ चलवा दी । इसमें सैंकड़ो लोग मारे गए। इससे चारों तरफ हिंसा फैल गई तो महात्मा गांधी ने आंदोलन को वापस ले लिया। 

✴️खिलाफत आंदोलन :-

यह मुस्लिम वर्ग द्वारा चलाया गया राजनीतिक धार्मिक आंदोलन था। गाँधीजी को लगा की खिलाफत का मुद्दा उठाकर हिंदू और मुसलमानों को एक मंच पर लाया जा सकता हैं। खलीफा की तरफदारी के लिए बंबई में मार्च 1919 में एक खिलाफत कमेटी बनाई गई।मुहम्मद अली और शौकत अली नामक दो भाई इस कमेटी के नेता थे वे भी यह चाहते थे कि महात्मा गाँधी इस मुद्दे पर जनांदोलन करें।1920 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में खिलाफत के समर्थन में और स्वराज के लिए एक अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत करने का प्रस्ताव पारित हुआ।

✴️असहयोग आंदोलन :-

अपनी प्रसिद्ध पुस्तक स्वराज (1909 ) में महात्मा गाँधी ने लिखा कि भारत में अंग्रेजी राज इसलिए स्थापित हो पाया क्योंकि भारतीयों ने उनके साथ सहयोग किया, यदि भारतीय सहयोग करना बंद कर दें, तो अंग्रेजी राज एक साल के अंदर ढह जायेगा और स्वराज आ जायेगा। 
असहयोग आंदोलन के कुछ प्रस्ताव :-
• अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रदान की गई उपाधियों को वापस करना। 
• सिविल सर्विस, सेना, पुलिस, कोर्ट, लेजिस्लेटिव काउंसिल, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार । 
• विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
• यदि सरकार अपनी दमनकारी नीतियों से बाज न आये, तो संपूर्ण अवज्ञा आंदोलन शुरू करना

✴️भारत की अर्थव्यवस्था पर असहयोग आंदोलन के प्रभाव:- असहयोग आंदोलन जनवरी 1921 मे शुरू हुआ। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार हुआ, शराब की दुकानों का घेराव किया गया और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। 1921 से 1922 तक विदेशी कपड़ों का आयात घटकर आधा हो गया।यह आंदोलन शहर से बड़कर ग्रामीण इलाके मे भी फैल गया था।

✴️बागानों में स्वराज:- इंडियन एमिग्रेशन ऐक्ट 1859 के अनुसार, चाय के बागानों में काम करने वाले मजदूरों को बिना अनुमति के बागान छोड़कर जाना मना था। जब असहयोग आंदोलन की खबर बागानों तक पहुँची, तो कई मजदूरों ने अधिकारियों की बात मानने से इंकार कर दिया। बागानों को छोड़कर वे अपने घरों की तरफ चल पड़े। लेकिन रेलवे और स्टीमर की हड़ताल के कारण वे बीच में ही फंस गए। पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और बुरी तरह पीटा।

✴️चौरी चौरा की घटना :-

5 फरवरी 1922 को भारतीयों ने ब्रिटिश सरकार की एक पुलिस स्टेशन में आग लगा दी थी जिससे उसमें छुपे हुए 22 पुलिस कर्मचारी और तीन नागरिक जिन्दा जल के मर गए थे। इस घटना को चौरीचौरा कांड के नाम से जाना जाता है। गांधी जी इस घटना से दुःखी होकर असहयोग आंदोलन वापस ले लेते है। 

✴️सविनय अवज्ञा आंदोलन :-

1921 के अंत आते आते, कई जगहों पर आंदोलन हिंसक होने लगा था। फरवरी 1922 में गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन को वापस लेने का निर्णय ले लिया । कांग्रेस के कुछ नेता भी जनांदोलन से थक से गए थे और राज्यों के काउंसिल के चुनावों में हिस्सा लेना चाहते थे राज्य के काउंसिलों का गठन गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ऐक्ट 1919 के तहत हुआ था । कई नेताओं का मानना था सिस्टम का भाग बनकर अंग्रेजी नीतियों विरोध करना। 
मोतीलाल नेहरू और सी आर दास जैसे पुराने नेताओं ने कांग्रेस के भीतर ही स्वराज पार्टी बनाई और काउंसिल की राजनीति में भागीदारी की वकालत करने लगे।
सुभाष चंद्र बोस और जवाहरलाल नेहरु जैसे नए नेता जनांदोलन और पूर्ण स्वराज के पक्ष में थे। 

✴️सविनय अवज्ञा आंदोलन की विशेषताएं:-

• लोगों को अब न केवल ब्रिटिशों के साथ सहयोग से इनकार करने के लिए कहा गया, बल्कि औपनिवेशिक कानूनों को तोड़ने के लिए भी कहा गया। 
• विदेशी कपड़े का बहिष्कार किया गया। 
शराब की दुकानों की पिकेटिंग होने लगी। 
• किसानों को राजस्व और चौकीदारी करों का भुगतान नहीं करने के लिए कहा गया था। 
• छात्रों, वकीलों और गांव के अधिकारियों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों, कॉलेजों, अदालतों और कार्यालयों में उपस्थित नहीं होने के लिए कहा गया ।

✴️साइमन कमीशन :- अंग्रेजी सरकार ने सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में एक वैधानिक कमीशन गठित किया। इस कमीशन को भारत में संवैधानिक सिस्टम के कार्य का मूल्यांकन करने और जरूरी बदलाव के सुझाव देने के लिए बनाया गया था लेकिन इस कमीशन में केवल अंग्रेज सदस्य ही थे एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, इसलिए भारतीय नेताओं ने इसका विरोध किया ।
साइमन कमीश 1928 में भारत आया । ' साइमन वापस जाओ' के नारों के साथ इसका स्वागत हुआ विद्रोह में सभी पार्टियाँ शामिल हुईं। अक्तूबर 1929 में लॉर्ड इरविन ने ' डॉमिनियन स्टैटस' की ओर इशारा किया था लेकिन इसकी समय सीमा नहीं बताई गई उसने भविष्य के संविधान पर चर्चा करने के लिए एक गोलमेज सम्मेलन का न्योता भी दिया। 
दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ था इसमें पूर्ण स्वराज के संकल्प को पारित किया गया । 26जनवरी1930 को स्वाधीनता(स्वतंत्रता) दिवस घोषित किया गया और लोगों से आह्वान किया गया कि वे संपूर्ण स्वाधीनता के लिए संघर्ष करें लेकिन इस कार्यक्रम को जनता का दबा-दबा समर्थन ही प्राप्त हुआ। 

✴️दांडी मार्च/नमक यात्रा :- देश को एकजुट करने के लिए महात्मा गांधी को नमक एक शक्तिशाली प्रतीक दिखाई दिया। 31 जनवरी 1930 को महात्मा गांधी ने वायसराय इरविन को एक पत्र भेजा जिसमें 11 माँगें थीं, जिनमें से एक नमक कर को समाप्त करने की माँग थी नमक अमीर और गरीब समान रूप से उपभोग किए जाने वाले सबसे आवश्यक खाद्य पदार्थों में से एक था। 
महात्मा गांधी का पत्र एक चेतावनी था, अगर 11 मार्च तक उनकी मांग पूरी नहीं हुई, तो सविनय अवज्ञा अभियान शुरू करने की धमकी दी थी। इरविन झुकने को तैयार नहीं था।
दांडी मार्च या नमक आंदोलन को गाँधीजी ने 12 मार्च 1930 को शुरु किया। उनके साथ 78 अनुयायी भी शामिल थे। उन्होंने 24 दिनों तक चलकर साबरमती से दांडी तक की 240 मील की दूरी तय की। कई अन्य लोग रास्ते में उनके साथ हो लिए। 6 अप्रैल को गांधी जी दांडी पहुँचे और उन्होंने समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाना शुरू किए कर दिया। यह कानून का उल्लंघन था। यही से सविनय अवज्ञा आंदोलन की शुरुआत होती हैं। 

✴️गोल मेज सम्मेलन/गांधी इरविन सामझौता:- स्थितियों में एक बार फिर से बदलाव आया और महात्मा गाँधी ने आंदोलन को वापस ले लिया। 5 मार्च 1931 को गांधी जी ने इरविन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। इसे गाँधी-इरविन पैक्ट कहा जाता है। इसके अनुसार, लंदन में होने वाले गोल मेज सम्मेलन में शामिल होने के लिए गाँधीजी तैयार हो गए। इसके बदले में सरकार राजनैतिक कैदियों को रिहा करने को राजी हो गई। 
गाँधीजी दिसंबर 1931 में लंदन गए। लेकिन वार्ता विफल हो गई और गाँधीजी को निराश होकर लौटना पड़ा। जब गाँधीजी भारत लौटे, तो उन्होंने पाया कि अधिकांश नेता जेल में थे। कांग्रेस को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था। महात्मा गाँधी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को दोबारा शुरु किया। लेकिन 1934 आते-आते आंदोलन की गति मंद हो गई थी।

✴️सविनय अवज्ञा की सीमाएँ:- शुरुआत में कांग्रेस ने दलितों पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि यह रुढ़िवादी सवर्ण हिंदुओं को नाराज नहीं करना चाहती थी। लेकिन महात्मा गाँधी ने घोषणा की कि छुआछूत को समाप्त किए बिना सौ साल तक स्वराज की प्राप्ति नहीं हो सकती। 'अछूतों' को हरिजन यानी ईश्वर की संतान बताया। 
डा. बी आर अंबेडकर ने 1930 में दलितों को दमित वर्ग एसोसिएशन मे गठन किया। दूसरे गोल मेज सम्मेलन के दौरान, दलितों के लिए पृथक चुनाव प्रक्रिया के मुद्दे पर उनका गाँधीजी से टकराव भी हुआ था। जब अंग्रेजी हुकूमत ने अंबेडकर की मांग मान ली तो गाँधीजी ने आमरण अनशन शुरु कर दिया। अंतत: अंबेडकर को गाँधीजी की बात माननी पड़ी। इसकी परिणति सितंबर 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर के रूप में हुई।

✴️1932 की पूना पैक्ट के प्रावधान :- सितंबर 1932 मे डॉ. अंबेडकर और गांधीजी के बीच पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर हुए। इसमे दमित वर्गो को केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिल गई लेकिन उनके लिए मतदान समान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होता था। 

✴️सामूहिकता की भावना :- सामूहिक अपनेपन की यह भावना आंशिक रूप से संयुक्त संघर्षों के चलते पैदा हुई थी। इतिहास व साहित्य, लोक कथाएं व गीत, चित्र व प्रतीक,सभी ने राष्ट्रवाद को साकार करने में अपना योगदान दिया था। राष्ट्रीय पहचान सबसे ज्यादा किसी तस्वीर में अंकित की जाती है। राष्ट्रवाद के विकास के साथ भारत की पहचान भी भारत माता की छवि का रूप लेने लगी यह तस्वीर पहली बार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने बनाई थी। 1870 मे मातृभूमि की स्तुति के रूप में वंदे मातरम गीत लिखा था। तिरंगे झंडे को मार्च के दौरान इसे धारण करना प्रतीक बन गया और सामूहिकता की भावना को बढ़ावा दिया। 














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