केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य Keshvanand Bharti Vs State of kerala

इस लेख में  हम बात करेंगे भारत के उस केस की जिसने भारतीय संविधान की सत्ता को सर्वोपरी रखने में अहम योगदान दिया और संविधान के बुनियादी ढाँचे को परिभाषित किया ।


24 अप्रैल 1973 को भारत की सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में एक एतिहासिक फैसला सुनाया था । इस फैसले को भारत के कानूनी इतिहास में एक मील का पत्थर माना जाता है । 

13 जजों की पीठ ने ये फैसला सुनाया था । इस फैसले में 7 जज इसके पक्ष में थे तो 6 जज इसके खिलाफ इस फैसले में ये कहा गया की भारतीय संविधान का बुनियादी ढांचा नहीं बदला जा सकता और इसमें संसद संशोधन भी नहीं कर सकती । बुनियादी ढांचे का मतलब है संविधान का सबसे ऊपर होना , कानून का शासन , न्यायपालिका की आजादी , संघ और राज्य की शक्तियों का बंटवारा , धर्मनिरपेक्षता , संप्रभुता , गणतंत्रीय ढांचा , सरकार का संसदीय तंत्र , निष्पक्ष चुनाव वगैरह वगैरह । 

केशवानंद भारती का ये मामला सुप्रीम कोर्ट में 68 दिनों तक सुनवाई हुई । कोर्ट में दलीलों की शुरुआत 31 अक्टूबर 1972 को हुई और 23 मार्च 1973 को ख़त्म हुई । इस मामले की सुनवाई के दौरान सैकड़ों मामलों का संज्ञान लिया गया । उस समय अटॉर्नी जनरल ने 71 देशों के सांविधानों के प्रावधानों का विश्लेषण कर बाकायदा एक चार्ट बनाया था ।

भारत का संविधान देश का मूलभूत कानून माना जाता है । देश के अन्य कई सारे कानूनों को इसी दस्तावेज़ के आधार पर अमली जामा पहनाया जाता है । दुनिया के कई देशों के संविधान ऐसे हैं जिनके कुछ भागों में कोई संशोधन नहीं किया जा सकता । इसके अलावा इन भागों को अन्य के मुकाबले कुछ और रियायतें भी दी गयी हैं । 

जब से भारतीय संविधान वजूद में आया तब से इस बात पर बहस होती रही हैं की क्या भारतीय संसद को संविधान के ख़ास प्रावधानों में संशोधन का हक़ है या नहीं .. 

आज़ादी के शुरुआती सालों में सुप्रीम कोर्ट ने संसद को संविधान में संशोधन करने की पूरी शक्तियां दे रखी थी । यह बात 1951 में शंकरी प्रसाद मामले और 1965 में दिए गए सज्जन सिंह मामले के फैसलों से ज़ाहिर हो जाती है । 

इसकी वजह ये मानी जा सकती है की शुरुआती सालों में सर्वोच्च न्यायालय को उस दौर की राजनीतिक नेतृत्व में भरोसा था । उस समय ज़्यादातर नेता वो लोग थे जिन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी । 

बाद के सालों में संविधान में सत्ताधारी लोगों के मुताबिक संविधान में बदलाव किये गए । इसी के चलते साल 1967 में गोलकनाथ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया की संसद मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती । मूल अधिकारों में संशोधन का अधिकार सिर्फ संवैधानिक सभा के पास रहेगा । 

संसद और न्यायपालिका में रस्साकशी : 

साल 1970 के शुरुआती दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संविधान में कुछ संशोधनों को अंजाम दिया । ये संशोधन थे 24 वां , 25 वां 26 वां और 29 वां । ये संशोधन इसलिए किये गए थे ताकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आर सी कूपर , माधव राव सिंधिया और गोलकनाथ मामलों में दिए गए फैसलों को खारिज किया जा सके । आर सी कूपर मामला बैंकों के राष्ट्रीयकरण के खिलाफ था , माधव राव सिंधिया मामला भारत में मिले देसी रियासतों को दिए जाने वाला पैसों ( प्रिवि पर्स ) को बंद करने के खिलाफ था और गोलक नाथ मामले में संसद द्वारा संविधान में लोगों को दिए गए बुनियादी अधिकार ( फंडामेंटल राइट्स ) में संशोधन करने के खिलाफ था ।

इन सारे संशोधनों और गोलक नाथ मामले को केशवानंद भारती मामले में चुनौती मिली । चूँकि गोलकनाथ मामले के दौरान 11 जजों की पीठ बनायी गयी थी इसलिए इसे ठीक करने के लिए 13 जजों की पीठ बनायी गयी । जाने माने न्यायविदों नानी पालखीवाला , फाली नरीमन और सोली सोराबजी ने सरकार के खिलाफ केस की पैरवी की ।

क्या था ये ऐतिहासिक मामला ? 

केरल में एक इडनीर नाम का हिंदू मठ था । इसके मठाधीश थे केशवानंद भारती । केरल सरकार ने दो भूमि सुधार कानून बनाए । इनकी मदद से सरकार मठ के मैनेजमेंट पर कई सारी पाबंदियां लगाने की कोशिश में थी । केसवानंद भारती ने सरकार की इन कोशिशों को अदालत में चुनौती दी । उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला दिया । संविधान के अनुच्छेद 26 के मुताबिक भारत के हर नागरिक को धर्म - कर्म के लिए संस्था बनाने , उनका प्रबंधन करने और इस सिलसिले में चल और अचल संपत्ति जोड़ने का हक़ देता है । केशवानंद भारती का कहना था कि सरकार का बनाया कानून उनके संवैधानिक अधिकार के खिलाफ है । केशवानंद को बस केरल सरकार से नहीं लड़ना था । उनका मुकाबला केंद्र सरकार से था । केंद्र सरकार , जिसकी मुखिया थीं इंदिरा गांधी ।

कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया ? 

सर्वोच्च न्यायालय में इस मामले की सुनवाई के लिए 13 जजों की एक बेंच बनाई गयी । इस पीठ की अगुवाई कर रहे थे उस समय के चीफ जस्टिस एस एम सीकरी । फैसले में जज एकमत नहीं थे । फैसले में सात जज एक पक्ष में थे तो छह जजों का पक्ष अलग था । फैसला सरकार के खिलाफ था । जिधर बहुमत था , उसका पक्ष फैसला बना । फैसले में कहा गया की संविधान का बुनियादी ढांचा नहीं बदला जा सकता है । संसद इसे किसी भी संशोधन से नहीं बदल सकती । बुनियादी ढांचे का मतलब है संविधान का सबसे ऊपर होना , कानून शासन , न्यायपालिका की आजादी , संघ और राज्य की शक्तियों का बंटवारा , धर्मनिरपेक्षता , संप्रभुता , गणतंत्रीय ढांचा , सरकार का संसदीय तंत्र , निष्पक्ष चुनाव वगैरह वगैरह । इसे ' बेसिक स्ट्रक्चर ' थिअरी कहते हैं । जिन सात जजों की वजह से ये फैसला दिया गया , उनके नाम थे CJI एस एम सीकरी , जस्टिस के एस हेगड़े , ए के मुखरेजा , जे एम शेलात , ए ऍन ग्रोवर , पी जगमोहन रेड्डी और एच आर खन्ना । जो इसके खिलाफ थे , उनके नाम थे जस्टिस ए एन रे , डी जी पालेकर , के के मैथ्यु , एम एच बेग , एस एन द्विवेदी और वाई के चंद्रचूड़ । 

केशवानंद मामले के फैसले के बाद से लेकर अभी तक संविधान के बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत को वरीयता दी जाती रही है । हालांकि कई आलोचकों ने बुनियादी ढाँचे के सिद्धांत को गैर प्रजाततंरिक कहा है । इनके मुताबिक जजों को संवैधानिक संशोधनों को खारिज करने का कोई हक़ नहीं है । वहीं दूसरी ओर इसके समर्थक इसे सही ठहराते हैं । समर्थकों के मुताबिक़ इस सिद्धांत से सरकार की तानाशाही पर अंकुश लगाया जा सकता है ।

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