Lesson-6 वर्षा सुन्दरी के प्रति, कवयित्री- महादेवी वर्मा

UP Board Class-10 Hindi( काव्य/पद्य खण्ड) Lesson-6, वर्षा सुन्दरी के प्रति, कवयित्री- महादेवी वर्मा [ संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या, काव्यगत सौन्दर्य, शब्दार्थ] exam oriented.Part-2


✍Chapter-6✍

🏔वर्षा सुन्दरी के प्रति🏔

🏞महादेवी वर्मा🏞

🪐हिंदी(काव्य-खण्ड)🪐

🗻Part-2🗻


वर्षा सुन्दरी के प्रति

प्रश्न 1.
रूपसि! तेरा घन-केश-पाश ! 
श्यामल- श्यामल कोमल-कोमल 
लहराता सुरभित केश-पाश! 
नभ-गंगा की रजतधार में । 
धो आयी क्या इन्हें रात ? 
कम्पित हैं तेरे सज़ल अंग, 
सिहरा सा तन है सद्यस्नात! 
भीगी अलकों के छोरों से 
चूती बूंदें कर विविध लास ! 
रूपसि! तेरा घन-केश पाश! [ 2013, 16, 17]

सन्दर्भ:- प्रस्तुत काव्य पंक्तियाँ श्रीमती महादेवी वर्मा द्वारा रचित 'नीरजा' नामक ग्रन्थ से हमारी पाठ्य- पुस्तक 'हिन्दी' के 'काव्य-खण्ड में संकलित 'वर्षा सुन्दरी के प्रति' शीर्षक कविता से अवतरित हैं।

व्याख्या:- कवयित्री वर्षा सुन्दरी को सम्बोधित करती हुई कहती है कि हे वर्षा सुन्दरी ! तेरा बादलरूपी काले-काले बालों का समूह अत्यधिक सुन्दर है। तुम्हारे कोमल, काले और सुगन्धित बाल हवा में लहरा रहे हैं, जो कि बहुत अच्छे लगते हैं।
कवयित्री पूछती है कि हे वर्षा सुन्दरी ! क्या तुम अपने इन बालों को रात में आकाश-गंगा की चाँदी के समान उजली जल-धारा में धोकर आयी हो? क्योंकि तुम्हारे सम्पूर्ण अंग जल में भीगे होने के कारण शीत से काँप रहे हैं। तुम्हारे रोमांचित और सिहरते शरीर को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे तुम अभी स्नान करके आयी हो; क्योंकि तुम्हारे भीगे बालों से जल की बूंदें नृत्य करती हुई-सी नीचे टपक रही हैं। हे वर्षा सुन्दरी! तुम्हारे बादलरूपी घने बालों का समूह बहुत ही सुन्दर प्रतीत हो रहा है।

प्रश्न 2.
सौरभ भीनी झीना गीला 
लिपटा मृदु अंजन-सा दुकूल
चल अंचल में झर-झर झरते
पथ में जुगनू के स्वर्ण-फूल
दीपक से देता बार-बार 
तेरा उज्ज्वल चितवन- विलास !
रूपसि! तेरा घन-केश-पाश! [2014, 15]

व्याख्या:- कवयित्री कहती है कि हे वर्षारूपी नायिका ! तुमने बादलों के रूप में एक सुगन्धित, पारदर्शक, कुछ गीला एवं हल्का काले रंग का झीना रेशमी वस्त्र धारण कर लिया है। आकाश में चमकने वाले जुगनू ऐसे लग रहे हैं, मानो तुम्हारे हिलते हुए आँचल से मार्ग में सोने के फूल झर रहे हों। बादलों में चमकती बिजली ही तुम्हारी उज्ज्वल चितवन है। जब तुम अपनी ऐसी सुन्दर दृष्टि किसी पर डालती हो तो उसके मन में प्रेम के दीपक जगमगाने लगते हैं। हे रूपवती वर्षा सुन्दरी! तुम्हारी बादलरूपी केश-राशि अत्यधिक सुन्दर है ।

प्रश्न 3.
उच्छवसित वक्ष पर चंचल है
बक-पाँतों का अरविन्द-हार, 
तेरी निश्वासे छू भू को 
बन-बन जातीं मलयज-बयार, 
केकी-रव की नृपुर ध्वनि सुन 
जगती जगती की मूक प्यास ! 
रूपसि! तेरा घन-केश-पाश ! [2013]

व्याख्या:- हे वर्षारूपी सुन्दरी! साँस लेने के कारण ऊपर उठे तथा कम्पित तेरे वक्ष स्थल पर आकाश में उड़ते हुए बगुलों की पंक्तियोंरूपी श्वेत कमलों का हार हिलता हुआ-सा मालूम पड़ रहा है। जब तुम्हारे मुख से निकली बूंदरूपी साँसें पृथ्वी पर गिरती हैं तो उसके (पृथ्वी के) स्पर्श से उठने वाली एक प्रकार की महक, मलयगिरि की सुगन्धित वायु के समान प्रतीत होती है। तुम्हारे आगमन पर चारों ओर नृत्य करते हुए मोरों की मधुर ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है, जो कि तुम्हारे पैरों में बँधे हुए धुंघरूओं के समान मालूम पड़ती है, जिसको सुनकर लोगों के मन में मधुर प्रेम की प्यास जाग्रत होने लगती है। हे वर्षारूपी सुन्दरी! तुम्हारी बादलरूपी बालों की राशि अत्यधिक सुन्दर है।

प्रश्न 4.
इन स्निग्ध लटों से छा दे तन 
पुलकित अंकों में भर विशाल; 
झुक सस्मित शीतल चुम्बन से 
अंकित कर इसका मृदल भाल; 
दुलरा देना, बहला दे ना 
यह तेरा शिशु जग है उदास !
रूपसि! तेरा घन-केश-पाश !

व्याख्या:- कवयित्री वर्षारूपी सुन्दरी से आग्रह करती है कि हे वर्षा सुन्दरी! तुम अपने कोमल बालों की छाया में इस संसाररूपी अपने शिशु को समेट लो। उसे अपने विशाल गोद में रखकर उसका सुन्दर मस्तक अपने बादलरूपी बालों से ढककर अपने हँसीयुक्त शीतल श्पर्श से चूम लो। हे सुन्दरी! तुम्हारे बादलरूपी बालों की छाया से और दुलार से इस संसाररूपी शिशु का मन बहल जाएगा और उसकी उदासी दूर हो जाएगी। हे वर्षारूपी सुन्दरी! तुम्हारी बादल रूपी काले बाल बड़ी मोहक लग रही है।

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