Lesson-5 चींटी(सुमित्रानंदन पंत)

UP Board Class-10 Hindi( काव्य/पद्य खण्ड) Lesson-5 (चींटी), कवि- सुमित्रानंदन पंत [ संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या, काव्यगत सौन्दर्य, शब्दार्थ] exam oriented.Part-1

✍Chapter-5 ✍

🐜चींटी(सुमित्रानंदन पंत)🐜

🐜Part-1🐜

🌼हिंदी(काव्य-खण्ड)🌼


प्रश्न 1.
चींटी को देखा? 
वह सरल, विरल, काली रेखा 
तम के तागे-सी जो हिल-डुल, 
चलती लघुपद पल-पल मिल-जुल 
वह है पिपीलिका पाँति ! 
देखो ना, किस भाँति । 
काम करती वह सतत ! 
कन-कन करके चुनती अविरत । [ 2012] 

सन्दर्भ:- प्रस्तुत पद्यांश प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा रचित 'युगवाणी' काव्य- संग्रह की "चींटी" शीर्षक से लिया गया है।

व्याख्या:- कवि प्रश्न करता है कि क्या तुमने कभी चींटी को ध्यानपूर्वक देखा है? चीटियों की पंक्ति एक सरल (सीधी) काली और विरल रेखा के समान प्रतीत होती है। वह अपने छोटे-छोटे पैरों से प्रति क्षण चलती रहती है। चीटियाँ जब मिलकर चलती हैं तो ऐसा मालूम पड़ता है जैसे कोई पतला काला धागा हिल-डुल रहा हो। कवि कहते है कि वह चीटियों की पंक्ति (कतार) है। तुम ध्यान से देखो कि वह किस प्रकार निरन्तर चलती रहती है। वह निरन्तर अपने काम में जुटी रहती है और अपने व अपने
परिवार के लिए छोटे-छोटे उपयोगी कणों को बिना रुके लगातार चुनती रहती है।

प्रश्न 2.
गाय चराती, 
धूप खिलाती, 
बच्चों की निगरानी करती, 
लड़ती, अरि से तनिक न डरती, 
दल के दल सेना सँवारती, 
घर आँगन, जनपथ बुहारती! 
चींटी है प्राणी सामाजिक, 
वह श्रमजीवी, वह सुनागरिक ! 

व्याख्या:- इतना ही नहीं, उसका भी घर-समाज है। यह गाय चराती है और उन्हें धूप खिलाती है। प्राणिशास्त्रियों के अनुसार चीटियों में भी गायें होती हैं। वे अपने बच्चों की देखभाल करती हैं, अपने शत्रुओं से निर्भय होकर लड़ती हैं, अपनी सेना सजाती हैं तथा घर, आँगन और रास्ते को साफ करती प्रतीत होती हैं।
चींटी एक सामाजिक प्राणी है। चींटी का अपना एक समाज होता है और उसी के साथ वह हिल - मिलकर नियमपूर्वक रहती है। वह कठोर परिश्रमी जीव है और उसमें एक अच्छे नागरिक के सभी गुण विद्यमान हैं।

प्रश्न 3.
देखा चींटी को ? 
उसके जी को ? 
भूरे बालों की सी कतरन, 
छिपा नहीं उसका छोटापन, 
वह समस्त पृथ्वी पर निर्भर
विचरण करती, श्रम में तन्मय, 
वह जीवन की चिनगी अक्षय।। 

व्याख्या:- कवि कहता है कि तुमने चींटी को ध्यान से देखा होगा। वह अत्यधिक लघु प्राणी है, परन्तु उसका हृदय एवं आत्मबल अत्यन्त विशाल है। चीटियों की पंक्ति बालों की कतरन के समान दिखाई देती है। उसकी लघुता को सभी जानते हैं, लेकिन उसके हृदय में असीम साहस है। वह सारी पृथ्वी पर, जहाँ चाहती है, निर्भय होकर विचरण करती है। उसे किसी भी स्थान पर घूमने में भय नहीं लगता है। वह लगातार अपने श्रम से, भोजन को एकत्र करने में जुटी रहती है। चींटी श्रम की साकार मूर्ति है। वह जीवन की कभी नष्ट न होने वाली चिंगारी है। चींटी एक अतिलघु प्राणी है, परन्तु उसमें जीवन की सम्पूर्ण ज्योति जगमगाती है।

प्रश्न 4.
वह भी क्या देही है, तिल-सी ? 
प्राणों की रिलमिल झिलमिल-सी ! 
दिन भर में वह मीलों चलती,
अथक, कार्य से कभी न टलती! 

व्याख्या:- कवि कहता है कि उसका शरीर बड़ा नहीं, अपितु वह तिल के समान अत्यन्त छोटा है। इतनी छोटी होते हुए भी चींटी शक्ति से भरी हुई इधर-उधर घूमती रहती है। दिनभर में वह कई मील की लम्बी यात्रा पूरी करती है, फिर भी वह कभी थकती नहीं है और निरन्तर अपने काम में जुटी रहती है। धूप, छाँव, शीत, वर्षा में भी वह अपना कार्य करने से नहीं चूकती है।


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