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जैन धर्म | महावीर स्वामी

जैन धर्म 

जैन धर्म से जुड़ी महत्पूर्ण जानकारी जैन धर्म से परीक्षा में पूछे जाने वाले महत्पूर्ण तथ्य 

जैन तीर्थकर के नाम एवं प्रतीक चिन्ह 
                        जैन तीर्थकर   ⟺  प्रतीक चिन्ह

प्रथम तीर्थकर     ➤ ऋषभदेव    ➤ साँड
द्वितीय तीर्थकर   ➤ अजितनाथ  ➤ हाथी 
तृतीय तीर्थकर     ➤ घोड़ा          ➤ संभव
सप्तम तीर्थकर    ➤ संपार्श्व        ➤ स्वास्तिक 
सोलहवाँ तीर्थकर ➤ शांति          ➤ हिरण
इक्कीसवें तीर्थकर➤ नामि           ➤ नीलकमल 
बाइसवें तीर्थकर   ➤ अरिष्टनेमि   ➤ शंख
तेइसवें तीर्थकर    ➤ सर्प             ➤ पार्श्व 
चौबीसवें तीर्थकर  ➤ महावीर       ➤सिंह 



जैनधर्म के संस्थापक एवं प्रथम तीर्थंकर थे - ऋषभदेव 
जैनधर्म के 23 वें तीर्थंकर थे - पार्श्वनाथ , ये  काशी के इक्ष्वाकु वशीय राजा अश्वसेन के पुत्र थे 
इन्होंने 30 वर्ष की अवस्था में संन्यास जीवन को स्वीकारा ।
इनके द्वारा दी गयी शिक्षा थी - 1. हिंसा न करना , 2. सदा सत्य बोलना , 3. चोरी न करना तथा 4.सम्पत्ति न रखना ।


महावीर स्वामी

➤महावीर स्वामी जैन धर्म के 24 वें एवं अंतिम तीर्थंकर थे । 
➤महावीर का जन्म हुआ था - 540 ईसा पूर्व, कुण्डग्राम (        वैशाली ) में ।
➤महावीर की मृत्यु हुई ( निर्वाण ) - 468 ईसा पूर्व, पावापुरी      ( राजगीर ) बिहार में ।
➤महावीर स्वामी के पिता थे - सिद्धार्थ ( ये ज्ञातक कुल ' के       सरदार थे )
➤महावीर स्वामी माता - त्रिशला ( ये लिच्छवि राजा चेटक        की बहन थी ) 
➤महावीर की पत्नी का नाम था - यशोदा  
➤महावीर की पुत्री का नाम था - अनोज्जा प्रियदर्शनी
➤महावीर के बचपन का नाम था - वर्द्धमान 

महावीर स्वामी ने 30 वर्ष की उम्र में माता - पिता की मृत्यु के पश्चात् अपने बड़े भाई नदिवर्धन से अनुमति लेकर संन्यास - जीवन को स्वीकारा था ।
12 वर्षों की कठिन तपस्या के बाद महावीर को जृम्भिक के समीप ऋजुपालिका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे तपस्या करते हुए सम्पूर्ण ज्ञान का बोध हुआ ।
इसी समय ( ज्ञान प्राप्ति के बाद )से महावीर जिन ( विजेता ) , अर्हत ( पूज्य ) और निर्ग्रन्थ ( बंधनहीन ) कहलाए ।

➤महावीर ने अपना उपदेश जिस भाषा में दिया था - प्राकृत (      अर्धमागधि) भाषा में ।
➤महावीर के अनुयायियों को मूलतः कहा जाता था - निग्रंथ।
➤महावीर के प्रथम अनुयायी थे - उनके दामाद जामिल।          ( प्रियदर्शनी के पति )  
➤प्रथम जैन भिक्षुणी थी - नरेश दधिवाहन की पुत्री चम्पा  
➤महावीर ने अपने शिष्यों को कितने गणधरों में विभाजित          किया था -11 गणधरों में 
➤अकेला ऐसा गन्धर्व था जो महावीर की मृत्यु के बाद भी।          जीवित रहा - आर्य सुधर्मा 
➤जैनधर्म का प्रथम थेरा या मुख्य उपदेशक हुआ -  आर्य सुर्धमा
➤दो जैन तीर्थकर जिनका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है - ऋषभदेव एवं अरिष्टनेमि 


लगभग 300 ईसा पूर्व में मगध में 12 वर्षों का भीषण अकाल पड़ा , जिसके कारण भद्रबाहु अपने शिष्यों सहित कर्नाटक चले गए । किंतु कुछ अनुयायी स्थूलभद्र के साथ मगध में ही रुक गए । भद्रबाहु के वापस लौटने पर मगध के साधुओं से उनका गहरा मतभेद हो गया जिसके परिणामस्वरूप जैन मत श्वेताम्बर एवं दिगम्बर नामक दो सम्प्रदायों में बँट गया ।
➤स्थूलभद्र के शिष्य कहलाए - श्वेताम्बर ( श्वेत वस्त्र धारण करने वाले ) 
➤भद्रबाहु के शिष्य कहलाए - दिगम्बर ( नग्न रहने वाले ) 

जैन धर्म में दो संगीतियाँ हुई - 
➤प्रथम जैन संगीति - 300 ई. पू. , पाटलिपुत्र में 
➤दूसरी जैन संगीति - छठीं शताब्दी ई. पू. , बल्लभी गुजरात में 

➤प्रथम जैन संगीति में अध्यक्ष थे -  स्थूलभद्र
➤दूसरी जैन संगीति में अध्यक्ष थे - क्षमाश्रवण

जैनधर्म के  त्रिरत्न -1 . सम्यक् दर्शन , 2. सम्यक् ज्ञान और 3. सम्यक आचरण । 
त्रिरत्न के अनुशीलन में निम्न पाँच महाव्रतों का पालन अनिवार्य है — अहिंसा , सत्य वचन , अस्तेय , अपरिग्रह एवं ब्रह्मचर्य ।




जैन धर्म से जुड़े मुख्य तथ्य 

➤जैनधर्म में ईश्वर की मान्यता नहीं है ।

➤जैनधर्म में आत्मा की मान्यता है ।

➤महावीर पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करते थे ।

➤जैनधर्म के सप्तभंगी ज्ञान के अन्य नाम स्यादवाद और अनेकांतवाद हैं । 

➤जैनधर्म ने अपने आध्यात्मिक विचारों को सांख्य दर्शन से ग्रहण किया । 

➤जैनधर्म मानने वाले कुछ राजा थे — उदयिन , वंदराजा , चन्द्रगुप्त मौर्य , कलिंग नरेश खारवेल , राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष , चंदेल शासक । 

➤खजुराहो में जैन मंदिरों का निर्माण चंदेल शासकों द्वारा किया गया । 

➤मौर्योत्तर युग में मथुरा जैन धर्म का प्रसिद्ध केन्द्र था ।

➤मथुरा कला का संबंध जैनधर्म से है ।

➤जैन तीर्थंकरों की जीवनी भद्रबाहु द्वारा रचित कल्पसत्र में है ।

➤किसके राजप्रसाद में महावीर स्वामी को निर्वाण प्राप्त हुआ था - मल्लराजा सृस्तिपाल के


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