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कैसे बनता है भारत का राष्ट्रपति

                      भारत का राष्ट्रपति

वर्तमान में भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद हैं।


राष्ट्रपति (अनुच्छेद 52)  

भारतीय संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित है ( अनुच्छेद 53 )


राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रधान होता है

राष्ट्रपति भारत का प्रथम नागरिक कहलाता है


राष्ट्रपति पद की योग्यता:- 

संविधान के अनुच्छेद 58 के अनुसार कोई व्यक्ति राष्ट्रपति होने योग्य तब होगा जब वह-
1. भारत का नागरिक हो

2. 35 वर्ष की आयु पूरी कर चुका हो

3. लोकसभा का सदस्य निर्वाचित किए जाने योग्य हो


4. चुनाव के समय लाभ का पद धारण नहीं करता हो


नोट- यदि व्यक्ति राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद पर हो या संघ अथवा राज्य की मंत्री परिषद का सदस्य हो तो वह लाभ का पद नहीं माना जाएगा।


राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचक मंडल (अनुच्छेद 54)

इसमें राज्यसभा लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्य रहते हैं। नवीनतम व्यवस्था के अनुसार पुडुचेरी विधानसभा तथा दिल्ली की विधानसभा के निर्वाचित सदस्य को भी सम्मिलित किया गया है।

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिए निर्वाचक मंडल के 50 सदस्य प्रस्तावक तथा 50 सदस्य अनुमोदक होते हैं।

एक ही व्यक्ति जितनी बार चाहे राष्ट्रपति के पद पर निर्वाचित हो सकता है।
राष्ट्रपति का निर्वाचन समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली और एकल संक्रमणीय मत पद्धति के द्वारा होता है (अनुच्छेद 55)

राष्ट्रपति के निर्वाचन से संबंधित विवादों का निपटारा उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है। निर्वाचन अवैध घोषित होने पर उसके द्वारा किए गए कार्य अवैध नहीं होते हैं।

राष्ट्रपति अपने पद ग्रहण की तिथि से 5 वर्ष की अवधि तक की अवधि तक पद धारण करता है। अपने पद की समाप्ति के बाद भी वह पद पर तब तक बना रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी पद ग्रहण नहीं कर लेता है। ( अनुच्छेद 56)

पद धारण करने से पूर्व राष्ट्रपति को एक निर्धारित प्रपत्र पर भारत के मुख्य न्यायाधीश अथवा उनकी अनुपस्थिति में उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठतम न्यायाधीश के सम्मुख शपथ लेनी पड़ती है।


राष्ट्रपति निम्न दशाओं में 5 वर्ष से पहले भी पद त्याग सकता है-

1. उपराष्ट्रपति को संबोधित अपने त्यागपत्र द्वारा, यह त्यागपत्र उपराष्ट्रपति को संबोधित किया जाएगा जो इसकी सूचना लोकसभा के अध्यक्ष को देगा।
2. महाभियोग द्वारा हटाए जाने पर। (अनुच्छेद 61)
महाभियोग के लिए केवल एक ही आधार है, जो अनुच्छेद 61 (1) में उल्लेखित किया है, वह है संविधान का अतिक्रमण।

राष्ट्रपति पर महाभियोग (अनुच्छेद 61)

राष्ट्रपति द्वारा संविधान के प्रावधानों के उल्लंघन पर संसद के किसी सदन द्वारा उस पर महाभियोग लगाया जा सकता है परंतु इसके लिए आवश्यक यह है कि राष्ट्रपति को 14 दिन पहले लिखित सूचना दी जाए जिस पर उस सदन के एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर  हो। संसद के उच्च सदन जितने महाभियोग का प्रस्ताव पेश है के दो तिहाई सदस्यों द्वारा पारित कर देने पर प्रस्ताव दूसरे सदन में जाएगा तब दूसरा सदन राष्ट्रपति पर लगाए गए आरोपों की जांच करवाएगा और ऐसी जांच में राष्ट्रपति के ऊपर लगाए गए आरोपों को सिद्ध करने वाला प्रस्ताव दो तिहाई बहुमत से पारित हो जाता है तब राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया पूरी समझी जाएगी और उसी तिथि से राष्ट्रपति को पद त्याग करना होगा।
राष्ट्रपति की रिक्ति को 6 महीने के अंदर भरना होता है।
जब राष्ट्रपति पद की रिक्ति पदावधि (5 वर्ष) की समाप्ति से हुई है तो निर्वाचन पदावधि की समाप्ति के पहले ठीक कर लिया जाएगा  अनुच्छेद 62 (1) । किंतु यदि उसे पूरा करने में कोई विलंब हो जाता है तो राज अंतराल ना होने पाए इसीलिए यह उपलब्ध है कि राष्ट्रपति अपने पद की अवधि पूरी हो जाने पर भी तब तक पद पर बना रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण नहीं कर लेता अनुच्छेद 56 (1) ग । ऐसी दशा में उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य नहीं कर सकेगा।

अन्य आकस्मिकताओं में राष्ट्रपति के कृतियों का निर्वाहन (अनुच्छेद 70):- 

जब राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति दोनों का पद रिक्त हो तो ऐसी आकस्मिकताओं में अनुच्छेद 70 राष्ट्रपति के कृतियों का निर्वहन का उपबंध करता है। इसके अनुसार संसद जैसा उचित समझे वैसा उपबंद कर सकती है। इसी उद्देश्य से संसद ने राष्ट्रपति उत्तराधिकार अधिनियम, 1959 ई. पारित किया है जो यह उपबंधित करता है कि यदि उपराष्ट्रपति भी किसी कारणवश उपलब्ध नहीं है तो उच्चतम न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश या उसके नहीं रहने पर उसी न्यायालय का वरिष्ठतम न्यायाधीश, जो उस समय उपलब्ध हो, राष्ट्रपति के कृत्यों को संपादित करेगा।


राष्ट्रपति के अधिकार एवं कर्तव्य-

1.नियुक्ति संबंधी अधिकार:- राष्ट्रपति निम्न की नियुक्ति करता है-

1. भारत के प्रधानमंत्री की
2. प्रधानमंत्री की सलाह पर मंत्रीपरिषद के अन्य सदस्यों की
3. सर्वोच्च एवं उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीशों की
4. भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की
5. राज्यों के राज्यपाल की
6. मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्तों की
7. भारत के महान्यायवादी की
8. राज्यों के मध्य समन्वय के लिए अंतर्राज्यीय सदस्यों की
9. संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की
10. संघीय क्षेत्रों के मुख्य आयुक्तों की
11. वित्त आयोग के सदस्यों की
12. भाषा आयोग के सदस्यों की
13. पिछड़ा वर्ग आयोग के सदस्यों की
14. अल्पसंख्यक आयोग के सदस्यों की
15. भारत के राजदूतों तथा अन्य राजनयिकों की
16. अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में रिपोर्ट देने वाले आयोग के सदस्यों आदि की नियुक्ति करता है।

2. विधायी शक्तियां:- 

राष्ट्रपति संसद का अभिन्न अंग होता है। इसे निम्न विधायी शक्तियां प्राप्त हैं -
1. संसद के सत्र को आहूत करने, सत्रावसान करने तथा लोकसभा भंग करने संबंधी अधिकार।

2. संसद के एक सदन में या एक साथ सम्मिलित रूप से दोनों सदनों में अभिभाषण करने की शक्ति।


3. लोकसभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात प्रथम सत्र के प्रारंभ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में सम्मिलित रूप से संसद में अभिभाषण करने की शक्ति।


4. संसद द्वारा पारित विधेयक राष्ट्रपति के अनुमोदन करने के बाद ही कानून बनता है।


5. संसद के निम्न विधेयक को पेश करने के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सहमति आवश्यक है-

(a)- नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्य के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन संबंधी विधेयक
(b)- धन विधेयक (अनुच्छेद 110)
(c)-  संचित निधि में व्यय करने वाले विधेयक ( अनुच्छेद 117(3) )
(d)- ऐसे कराधान पर, जिसमें राज्य हित जुड़े हैं, प्रभाव डालने वाले विधेयक
(e)- राज्यों के बीच व्यापार, वाणिज्य और समागम पर निर्बंधन लगाने वाले विधेयक (अनुच्छेद 304)

6. यदि किसी कारण विधेयक पर दोनों सदनों में कोई असहमति है तो उसे सुलझाने के लिए राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है (अनुच्छेद 108) ।


3. संसद सदस्यों के मनोनयन का अधिकार:-

जब राष्ट्रपति को यह लगे कि लोकसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय के व्यक्तियों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है, तब गए उस समुदाय के दो व्यक्तियों को लोकसभा के सदस्य के रूप में नामांकित आ सकता है (अनुच्छेद 331) ।
इसी प्रकार वह कला, साहित्य, पत्रकारिता, विज्ञान तथा सामाजिक कार्यों में पर्याप्त अनुभव एवं दक्षता रखने वाले 12 व्यक्तियों को राज्यसभा में नामजद कर सकता है (अनुच्छेद 80(3) ) ।

4. अध्यादेश जारी करने की शक्ति:- 

संसद के स्थगन के समय अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेश जारी कर सकता है, जिसका प्रभाव संसद के अधिनियम के समान होता है। इसका प्रभाव संसद सत्र के शुरू होने के 6 सप्ताह तक रहता है । परंतु, राष्ट्रपति राज्य सूची के विषयों पर अध्यादेश नहीं जारी कर सकता, जब दोनों सदन सत्र में होते हैं, तब राष्ट्रपति को यह शक्ति नहीं होती है।

5. सैनिक शक्ति:- 

सैन्य बलों की सर्वोच्च शक्ति राष्ट्रपति में सन्निहित है, किंतु इसका प्रयोग विधि द्वारा नियमित होता है।

6. राजनैतिक शक्ति:- 

दूसरे देशों के साथ कोई भी समझौता या संधि राष्ट्रपति के नाम पर की जाती है। राष्ट्रपति विदेशों के लिए भारतीय राजदूतों की नियुक्ति करता है एवं भारत में विदेशों के राजदूतों की नियुक्ति का अनुमोदन करता है।

7. क्षमादान की शक्ति:- 

संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए किसी व्यक्ति के दंड को क्षमा करने, उसका प्रविलंबन, परिहार और लागू करने की शक्ति प्राप्त है। शमा में दंड और बंदी करण दोनों को हटा दिया जाता है। लघु करण में दंड के स्वरूप को बदलकर कम कर दिया जाता है, जैसे मृत्युदंड का लघु करण कर कठोर जा साधारण कारावास में परिवर्तित करना। परिहार में दंड की प्रकृति में परिवर्तन किए बिना उसकी अवधि कम कर दी जाती है। जैसे 2 वर्ष के कठोर कारावास को 1 वर्ष के कठोर कारावास में परिहार करना। प्रविलंबन में किसी दंड पर रोक लगाना है ताकि दोषी व्यक्ति क्षमा याचना कर सकें। विराम में किसी दोषी के सजा को विशेष स्थिति में कम कर दिया जाता है जैसे गर्भवती स्त्री की सजा को कम कर देना।

नोट- जब क्षमादान की पूर्व याचिका राष्ट्रपति ने रद्द कर दी हो तो दूसरी याचिका दायर नहीं की जा सकती।


8. राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां:- 

आपातकाल से संबंधित उपबंध भारतीय संविधान के भाग- 18 के अनुच्छेद 352 से 360 के अंतर्गत मिलता है। मंत्रीपरिषद के परामर्श से राष्ट्रपति तीन प्रकार के आपात लागू कर सकता है-
(a)- युद्ध या बाह्य आक्रमण सशस्त्र विद्रोह के कारण लगाया गया आपात (अनुच्छेद 352) ।
(b)- राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) ।
(c)- वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)

9. राष्ट्रपति किसी सार्वजनिक महत्व के प्रश्न पर उच्चतम न्यायालय से अनुच्छेद 143 के अधीन पर परामर्श ले सकता है, लेकिन वह यह परामर्श मानने के लिए बाध्य नहीं है।


10. राष्ट्रपति की किसी विधेयक पर अनुमति देने या ना देने के निर्णय लेने की सीमा का अभाव होने के कारण राष्ट्रपति जेबी वीटो का प्रयोग कर सकता है, क्योंकि अनुच्छेद 111 केवल यह कहता है कि यदि राष्ट्रपति विधायक लौटाना चाहता है तो विधेयक को उसे प्रस्तुत किए जाने के बाद यथाशीघ्र लौटा देगा। जेबी वीटो शक्ति का प्रयोग का उदाहरण है, 1886 ई. में संसद द्वारा पारित भारतीय डाकघर संशोधन विधायक, जिस पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने कोई निर्णय नहीं लिया। 3 वर्ष पश्चात 1989 ई. में अगले राष्ट्रपति आर. वेंकटरमन ने इस विधेयक को नई राष्ट्रीय मोर्चा सरकार के पास पुनर्विचार हेतु भेजा परंतु सरकार ने इसे रद्द करने का फैसला लिया।



√ डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति थे। वे लगातार दो बार राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।


√ डॉ एस राधाकृष्णन लगातार दो बार उपराष्ट्रपति तथा एक बार राष्ट्रपति रहे।


√ केवल वी. वी. गिरि के निर्वाचन के समय दूसरे चक्र की मतगणना करनी पड़ी।


√ केवल नीलम संजीव रेड्डी ऐसे राष्ट्रपति हुए जो एक बार चुनाव में हार गए, फिर बाद में निर्विरोध राष्ट्रपति निर्वाचित हुए।


√ भारत की प्रथम महिला राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल हैं।


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